

दिल्ली की कंपनी मेसर्स नोवासेंसा प्राइवेट लिमिटेड ने ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग प्लांट स्थापित करने हेतु राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला, जमशेदपुर से टेक्नोलोजी लेने हेतु करार किया था।
इस करार (MoU) में वेस्ट प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) से कॉपर, अल्यूमिनियम और गोल्ड का पुनर्चक्रण करने के लिए तकनीकी का हस्तांतरण हुआ था। इस दिशा में आज गुरुवार, दिनांक 21 नवम्बर 2024 को करार (MoU) के अनुरूप राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला में तकनीक को प्रयोगशाला स्तर पर करके दिखाया गया।
तकनीकी पर्यावरण अनुकूल हैं एवं इसके सही निस्पादन से पर्यावरण स्वच्छ होगा, बेरोजगार युवकों को नौकरी मिलेगी एवं असंगठित इकाई संगठित होकर कचड़ा उठाव एवं निस्पादन इस प्लान्ट के द्वारा कर सकेंगे। मुनिसिपल इकाई भी इस कंपनी से संपर्क कर कचड़ा निस्पादन कर पाएंगे। नोवासेंसा प्राइवेट लिमिटेड खराब हो चुके प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) का प्रोसेसिंग करके कीमती एवं बहुमूल्य धातुओं कॉपर, अल्यूमिनियम और गोल्ड इत्यादि का निष्कर्षण करेगा।
जो पूर्ण रूप से ई-कचड़ा के लिए बहुमूल्य तोहफा हैं, कारण रिसाइक्लिंग ज़ीरो वेस्ट कोंसेप्ट पर कार्य करेगा। "प्रिंटेड सर्किट बोर्ड से गोल्ड, कॉपर और अल्यूमिनियम निष्कर्षण का नया तरीका" ज्ञात हो की एनएमएल पहले भी राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ई-कचड़ा निष्पादन हेतु तकनीकी हस्तांतरण कर चुका है। सर्वप्रथम प्रिंटेड सर्किट बोर्ड को प्री-ट्रीटमेंट और फिजिकल बेनीफिसिएसन पद्धति के द्वारा इपोक्सी रेसिन (प्लास्टीक) एवं धातु मिश्रण को अलग कर लिया जाता है, फिर हैड्रोमेटलर्जी पद्धति का प्रयोग कर गोल्ड, कॉपर और अल्यूमिनियम को निकाल लिया जाता है।
सारे मेटल मार्केट के जरूरत के हिसाब से मेटल साल्ट या मेटल उत्पादन किया जाता है। स्केल अप प्रोसेस का डेमोन्स्ट्रेसन एवं ट्रेनिंग नोवासेंसा के लोगों को एनएमएल के द्वारा दिया गया। नोवासेंसा जल्द ही इस टेक्नॉलाजी को व्यवसायिक स्तर पर लगाने जा रहा है।
इस मौके पर एनएमएल, जमशेदपुर के निदेशक डॉ. संदीप घोष चौधरी, परियोजना प्रमुख डॉ. मनीष कुमार झा, प्रभाग प्रमुख डॉ. संजय कुमार, डॉ. झुमकी हैत, डॉ. एस. के. साहु, डॉ. रंजीत कुमार सिंह, डॉ. कृष्णा कुमार, डॉ. अंकुर शर्मा, श्री शिवेंदर सिन्हा एवं टीम शोधार्थी डॉ. रेखा पांडा, सुश्री रुकसाना परवीन, सुश्री करीना रानी ने तकनीकी हस्तांतरण में अपना योगदान दिया। इनके अलावा व्यापार प्रमुख डॉ. एस. के. पाल और डॉ. बीणा कुमारी तकनीकी हस्तांतरण डोकुमेंटेसन करवाने में अपना सहयोग किया।
डॉ. अंजनी कुमार साहु ने एमओयू सम्बन्धित कार्यों में एवं ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग के क्षेत्र में भारत मे भावी संभावनाओं की ओर प्रेस एवं मीडिया को इंगित किया। सम्माननीय वक्तव्य एनएमएल, जमशेदपुर के निदेशक डॉ. संदीप घोष चौधरी ने खुशी व्यक्त की और कहा कि, “हाल के दिनों में एनएमएल ने कई स्वदेशी तकनीकें भारतीय कम्पनियों को हस्तांतरित की हैं और आशा है कि भविष्य में हम ई-कचरा मुक्त भारत बनाने के लिए और अधिक से अधिक प्रौद्योगिकी स्थानांतरित करेंगे”।
मेसर्स नोवासेंसा प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, के संस्थापक और सीईओ श्री असीम त्रिवेदी अपने व्यवसाय का विस्तार करते हुए अब वेस्ट प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) से रिसाइक्लिंग के व्यवसाय में प्रवेश कर रहे हैं। इस तकनीक का उपयोग करके वे इलेक्ट्रॉनिक कचरे को प्रभावी ढंग से प्रबंधित कर सकेंगे।
सीमित प्राकृतिक संसाधनों की अत्यधिक चिंता को ध्यान में रखते हुए, उन्होने कहा कि, " वे इस तकनीक का उपयोग करके देश में इलेक्ट्रॉनिक कचरा प्रबंधन में महत्वपूर्ण योगदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। प्रदूषण मुक्त समाज बनाने के साथ-साथ भावी पीढ़ी के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करके देश की सेवा करने के लिए वेस्ट प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) से रिसाइक्लिंग तकनीक लेकर एवं सीएसआईआर-एनएमएल, जमशेदपुर का हिस्सा बनकर मुझे बहुत खुशी हो रही है।” मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा है जब मैं और एनएमएल की टीम भारत सरकार के स्वच्छता मिशन के अनुरुप काम कर रहे हैं । औद्योगिक क्षेत्र की तमाम कंपनी हमारे तकनीकी से प्रसन्न है।
डॉ. मनीष कुमार झा, परियोजना प्रमुख, मुख्य वैज्ञानिक, सीएसआईआर - एनएमएल "सीएसआईआर- एनएमएल की तकनीक से नोवासेंसा बनाएगी ई-कचरा मुक्त भारत" जो ई-कचरा पर्यावरण के लिए चुनौती बन रहा था, अब उसी की रिसाइक्लिंग न सिर्फ फायदे का सौदा बन गया हैं वरन उससे रोजगार के अवसर भी उत्पन्न हो रहे हैं। यहा संभव हुआ हैं सीएसआईआर- राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (एनएमएल), जमशेदपुर द्वारा ईजाद की गई तकनीक से। चीन, जापान, अमेरिका, दक्षिण कोरिया सहित कई विकसित देशों की तरह अब भारत भी वेस्ट प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) का निष्पादन करेगा।
इस तकनीक का इस्तेमाल कर देश की कई बड़ी कम्पनियों ने खराब और बेकार हो चुकी प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) की रिसाइक्लिंग शुरू की हैं। नोवासेंसा रिसाइक्लिंग कंपनी में एनएमएल की तकनीक की बदौलत वेस्ट प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) का निष्पादन होगा। इस तकनीक की मदद से यह कम्पनी अलौह धातु जैसी कीमती धातुओं का भी निष्कर्षण करेगी। ऐसी कंपनियों की स्थापना से शिक्षित बेरोजगारों को काम मिलेगा।
इसका फायदा नगर निकायों के द्वारा भी उठाया जा सकता है। प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों जैसे कि कम्प्युटर एवं इलेक्ट्रोनिक उपकरणों में मुख्यतः होता है। समय सीमा समाप्त होने के बाद यदि वातावरण में जाने से प्रदूषण होता है। यदि उसे रिसायकिल किया जाए तो कॉपर, अल्यूमिनियम और गोल्ड जैसी मुल्यवान वस्तुओं की प्राप्ति की जा सकती है।
साथ साथ पर्यावरण का भी संरक्षण होगा। एनएमएल के अनुसार यदि वेस्ट प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) की मात्रा इसी तरह दिनोंदिन बढ़ती गई तो भविष्य में इलेक्ट्रोनिक वेस्ट से निकलने वाली भारी धातु एवं अन्य प्रदूषित पदार्थ मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए नुकसानदेह साबित होगा। "ई-कचरा: बढ़ती समस्या और एनएमएल का समाधान" राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (एनएमएल) जमशेदपुर के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसीत की है जिससे वेस्ट प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) की समस्या से ना केवल निजात मिलेगी बल्कि उनका पुनर्चक्रण कर प्राकृतिक स्त्रोत को भी बचा पाएँगे। रिसाइक्लिंग के द्वारा कॉपर, अल्यूमिनियम और गोल्ड जैसे महत्वपूर्ण धातुओं का उत्पादन किया जा सकेगा।
एनएमएल शून्य अपशिष्ट के लक्ष्य ये है, जिससे की कई हद तक ई- वेस्ट से निजात मिलेगी राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (एनएमएल) भारत में पहला अनुसंधान है जो ई-वेस्ट के पुनः चक्रण के उद्योग उन्मुख विकास के लिए भारत में अग्रीम श्रेणी में काम कर रहा है।
दुनिया के देशों मे तेजी से बढ़ती इलेक्ट्रॉनिक क्रान्ति से एक तरफ जहाँ आम लोगों की इस पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। लैपटॉप, टेलीविज़न, फोटो-कोपिअर, फ़ैक्स मशीन, कैल्कुलेटर और कबाड़ बन चुके पुराने कम्प्युटरों के ई-वेस्ट भारी तबाही के तौर पर सामने आ रहे है, जैसे कि मृदा प्रदूषण, जल एवं वायुप्रदूषण और अनेकानेक गम्भीर बीमारियाँ उत्पन्न हो रही हैं। भारत में लैपटॉप और कम्प्युटर की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।
कम्प्युटर के अलावा फ़ैक्स मशीन और फोटो- कोपीयर इत्यादि ने मानव जीवन मे सुविधाएँ बढ़ाई हैं तो ई-कचरें के रूप में बड़ी समस्या को भी जन्म दिया है। इनमें से ज़्यादातर उपकरणों मे लिथियम आयन बैटरी होती है जो एक निश्चित समय के बाद काम की नही रहती और ई-कचरें का रूप ले लेती हैं। बड़ी संख्या मे इसका अनियंत्रित प्रबंधन व निस्पादन पर्यावरण को भारी नुकसान पहुचा रहा है। मिट्टी व जल-प्रदूषण, मानव जीवन तथा जलीय जीव-जन्तुओं को भी इससे नुकसान हो रहा हैं। खास बात यह हैं कि इस वेस्ट प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) में कॉपर, अल्यूमिनियम और गोल्ड पाया जाता है, जिसका भारत मे दूसरे देशों से आयात किया जाता हैं।
भारत के पास कोबाल्ट का भंडार भी नही हैं। वेस्ट प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) का पुनःचक्रण करके कॉपर, अल्यूमिनियम और गोल्ड जैसी धातुओं का उत्पादन किया जा सकता हैं, वह भी पर्यावरण और जीव-जन्तुओं को नुकसान पहुंचाएँ बिना। ई-कचरा प्रबंधन में भारत की स्थिति चिंताजनक देश में ई-कचरा प्रबंधन की स्थिति चिंताजनक है। असंगठित क्षेत्रों में गैरकानूनी ढंग से ई-कचरे का निपटान किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण और स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।
एक अनुमान के मुताबिक, लाखों लोग असंगठित रूप से ई-कचरा निपटान इकाइयाँ चला रहे हैं, जहाँ हाथ से काम होता है और जहरीले कचरे से स्वास्थ्य पर बुरा असर हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि असंगठित इकाइयों से काम कराते हैं ताकि लागत में कमी आए, लेकिन इससे होने वाला नुकसान बहुत बड़ा है। अमेरिका और ब्रिटेन में निर्माण कंपनियों को अपने उत्पादों के ई-कचरे का निपटान करने की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन भारत में इस बात का प्रावधान 2011 में कर दिया गया है, लेकिन उसका पालन सही तरीके से नहीं हो रहा है। दुनिया में सबसे ज्यादा ई-कचरा पैदा करने वाले शीर्ष पांच देशों में भारत भी है।
इसके अलावा इस सूची में चीन, अमेरिका, जापान और जर्मनी है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, 2023 में दुनिया भर में प्रति व्यक्ति आठ किलोग्राम ई-कचरा पैदा हुआ। इसका मतलब है कि एक साल के भीतर 6.13 करोड़ टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा फेंका गया, जो चीन की सबसे बड़ी दीवार के वजन से भी अधिक है। इस कचरे का केवल 17.4 प्रतिशत, जिसमें हानिकारक पदार्थ और कीमती सामग्री का मिश्रण है, दुनिया भर में ठीक से एकत्र, उपचारित और पुनर्चक्रित किए जाने के रूप में दर्ज किया जाता है।
शेष 5.06 करोड़ टन को या तो लैंडफिल में डाल दिया जाता है, या जला दिया जाता है, या इसका अवैध रूप से व्यापार किया जाता है। यहां तक कि यूरोप में, जो ई-कचरा रीसाइक्लिंग में दुनिया में सबसे आगे है,केवल 54 प्रतिशत ई-कचरा आधिकारिक तौर पर एकत्र और रीसायकल होने की रिपोर्ट है। सार्वजनिक जागरूकता की कमी देशों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए सर्कुलर अर्थव्यवस्था विकसित करने से रोक रही है।
ई-कचरे में सोना, चांदी और तांबा जैसे मूल्यवान और दुर्लभ तत्व भी होते हैं, जिन्हें क्रिटिकल रॉ मटेरियल कहा जाता है,जो पर्यावरण के हिसाब से अनुकूल और नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं। जब ई-कचरे को ठीक से रिसाइकिल नहीं किया जाता है, तो ये मूल्यवान सामग्री बेकार हो जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, ई-कचरा दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाले ठोस कचरे में से एक है। साल 2022 में दुनिया भर में लगभग 6.2 करोड़ टन ई-कचरा उत्पादित किया गया। केवल 22.3 फीसदी को औपचारिक रूप से एकत्र और रीसायकल किया गया था। सीसा एक सामान्य पदार्थ है जो पर्यावरण में तब निकलता है जब ई-कचरे को खुले में जलाने सहित सही तरीके से रीसायकल नहीं किया जाता है, सही तरह से एकत्रित या डंप नहीं किया जाता है।
सही तरीके से ई-कचरे का रीसायकल न होने पर इसके स्वास्थ्य पर कई प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं। बच्चे और गर्भवती महिलाएं विशेष रूप से इसके कारण असुरक्षित हैं। आईएलओ और डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि दुनिया भर में सही तरीके से रीसायकल न करने से क्षेत्र में काम करने वाली लाखों महिलाएं और बाल मजदूर खतरनाक ई-कचरे के संपर्क के खतरे में हैं।
यूनाइटेड नेशन इंस्टीट्यूट फॉर ट्रेनिंग एंड रिसर्च (यूनिटार) की मानें तो 2030 तक इलेक्ट्रॉनिक कचरे में 32 फीसदी की बढ़ोतरी होकर 8.2 करोड़ टन होने के आसार हैं।
इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार और उद्योगों को मिलकर काम करना होगा ताकि ई-कचरा प्रबंधन को व्यवस्थित और सुरक्षित बनाया जा सके। "सीएसआईआर- एनएमएल का योगदान ई-कचरा प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण कदम (पर्यावरण और रोजगार पर प्रभाव)" सीएसआईआर- राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला ने ई-कचरा प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इस संस्थान ने पिछले 15 वर्षों से अंतराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट टेक्नालजी का हस्तांतरण किया है, जो पर्यावरण अनुकूल है और इसके सही निष्पादन से पर्यावरण स्वच्छ होगा, बेरोजगार युवकों को नौकरी मिलेगी एवं असंगठीत इकाई संगठीत होकर कचड़ा उठाव एवं निष्पादन इस प्लांट के द्वारा कर सकेंगे।
उभरतें बाज़ारों में निजी क्षेत्र पर केन्द्रित विकास वित्त संस्थान अन्तराष्ट्रीय वित्त निगम ने अनुमान जाहीर किया है कि वर्ष 2030 तक ई-वेस्ट के क्षेत्र में भारत में लगभग 5 लाख नौकरियों का सृजन हो सकता है। आईएफ़सी के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक कचड़ा क्षेत्र में सम्पूर्ण शृंखला-संग्रह, एकत्रीकरण, निराकरण और रिसाइक्लिंग में 2030 तक 45,0000 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे। इसके अलावा हजारों की संख्या में अप्रत्यक्ष रोजगार भी सृजित होगा।
साथ ही परिवहन और विनिर्मान जैसे सम्बंध क्षेत्र में भी 18,0000 नौकरियाँ पैदा होने की सम्भावना है। डॉ मनीष कुमार झा, मुख्य वैज्ञानिक, ई-वेस्ट रिसाइकलिंग प्रोजेक्ट का पिछले 15 साल से नेतृत्व कर रहे हैं।
उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रिय स्तर पर एनएमएल की पहचान ई-वेस्ट प्रोसेसिंग टेक्नालजी ट्रान्सफर के लिए हो गई हैं। भारत के अंदर अभी तक एनएमएल के मार्गदर्शन में 13 कम्पनियाँ वाणिज्यिक स्तर पर ई-वेस्ट का रिसाइकलिंग कर रही हैं। इस प्रकार, सीएसआईआर- राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला का योगदान ई-कचरा प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे पर्यावरण स्वच्छ होगा, बेरोजगार युवकों को नौकरी मिलेगी एवं असंगठीत इकाई संगठीत होकर कचड़ा उठाव एवं निष्पादन इस प्लांट के द्वारा कर सकेंगे।