श्री चरण हेम्ब्रम एक संथाली (ओल चिकी) शिक्षाविद और सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने ओडिशा में संथाली भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार और संस्थागत विकास में असाधारण योगदान दिया है। 
 
2. 09 फरवरी, 1952 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के राइरंगपुर अंतर्गत नुंगन गाँव में जन्में श्री हेम्ब्रम संथाल समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और समायिज़्म को पालन करते हुए उन्होंने वर्ष 1971 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और इसके पश्चात उन्होंने स्वयं को संथाली (ओल चिकी) शिक्षा को समर्पित कर दिया। वर्ष 1977 में उन्होंने राइरंगपुर स्थित एएसईसीए (ओ) से शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया, वर्ष 1988 में बीएसई (ओ), एएसईसीए के अधीन मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और इसके बाद विभिन्न पेशेवर और विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया। 
 

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3. श्री हेम्ब्रम ने संथाली शिक्षा में, विशेषकर वर्ष 1992 से 2004 तक एएसईसीए (ओ), राइरंगपुर के अधीन ओडिशा संथाली शिक्षा बोर्ड के सचिव के रूप में कार्यकाल के दौरान, परिवर्तनकारी भूमिका निभाई। 

इस अवधि में कई महत्वपूर्ण संस्थागत विकास हुए, जिनमें ओडिशा सरकार द्वारा 30 ओल चिकी शिक्षकों की नियुक्ति (1992), एएसईसीए (ओ) भवन का उद्घाटन (1994), प्रशासनिक और भौतिक ढांचे का विकास और एसईएमएलईडी प्रेस का पुनः उद्घाटन शामिल हैं। उन्होंने ओल चिकी स्टूडेंट्स यूनियन के गठन के माध्यम से छात्र आंदोलनों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया और साहित्य अकादमी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा आयोजित राष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठियों, आदिवासी भाषा चर्चाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1992–2004 के बीच उन्होंने ओडिशा में 1,973 ओल इटुन आसराओं की स्थापना और मान्यता सुनिश्चित कर संथाली शिक्षा के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 

3. शैक्षिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में अग्रणी के रूप में, श्री हेम्ब्रम ने कई ओल इटुन आश्राओं की स्थापना की, जिनमें बिदुचंदन ओल इटुन आसरा (कुसुमी), सिदो कन्हू ओल इटुन आसरा (नेउति), जे.जे.एम. ओल इटुन आसरा (महिसानेदा, 1991) और ओल इटुन आसरा (डिगिरीपाही, बालासोर, 2001) शामिल हैं। 

उन्होंने उरल उसरा मार्शल मदवा (1989), जे.जे.एम. ओपेरा पार्टी (1992) और मार्शल ओपेरा (1988) जैसे संथाल अखरा और ओपेरा समूहों की स्थापना और निर्देशन भी किया। एक सक्रिय लेखक और संगीतकार के रूप में, उन्होंने संथाली में पुस्तकें लिखीं, जिनमें ‘सेरेंग संध्यानी’, ‘भंज मिली’ (1949) और ‘सिरिज रेनांग साड़ी परटाल’ शामिल हैं। कई सरकारी और साहित्यिक पत्रिकाओं में उनके लेख भी प्रकाशित हुए। उन्होंने संथाली ऑडियो एल्बम के लिए गीत भी रचे और आज भी संथाली साहित्य और संगीत विरासत में योगदान दे रहे हैं। 

 

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4. संथाली साहित्य, संगीत, नृत्य, नाटक और सामाजिक सेवा में अपार योगदान के सम्मान में श्री हेम्ब्रम को कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, जिनमें ‘सर्वश्रेष्ठ आदिवासी नाटक निर्देशक’ (1978), ‘सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक’ (1997), ‘गुरु गौरव पुरस्कार’ (2002), ‘सेनेरेंज गुरु पुरस्कार’ (2004), ‘गुरु श्री पुरस्कार’ (2004), और प्रतिष्ठित ‘गुरु गोमकी पंडित रघुनाथ मुर्मू फेलोशिप’ (2004) शामिल हैं। विगत वर्षों में उन्हें ‘संथाली सांस्कृतिक गुरु’ (2006), ‘संथाली संगीत गुरु’ (2009), ‘बोनसोखा’ (2011), ‘संथाल कवि’ (2012), ‘चिकी हुलगड़िया’ (2015), और ‘प्रकृति बंधु’ (2017) जैसे सम्मान प्रदान किए गए। वर्ष 2018 में उन्हें आदिवासियों में सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण और शैक्षिक विकास में उनके योगदान के लिए बीर बिरसा मुंडा की 143वीं जयंती पर सम्मानित किया गया।

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