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ये सभी जानते हैं कि झारखंड में मानव तस्करों के निशाने पर सबसे अधिक नाबालिग लड़कियां होती हैं। इसका खुलासा पुलिस जांच और गिरफ्तार मानव तस्करों के बयान से कई बार हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण सरोगेसी से मां बनना भी है। गुमला की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के पास ऐसे दो मामले आ चुके हैं।

पीड़ित नाबालिगों ने स्वीकारा था कि उन्हें रोजगार का झांसा देकर तस्कर महानगरों में ले गए थे, लेकिन वहां उनसे बच्चे को जन्म देने के लिए विवश किया गया। एक ने 10 तो दूसरी ने 6 बच्चों को जन्म दिया है। पीड़िताओं ने कहा कि उनकी तस्करी तब हुई थी, जब उनकी उम्र 13-14 साल की थीं।

महानगरों की तरह धीरे-धीरे रांची सहित झारखंड के कई शहरों में सरोगेसी यानी किराए की कोख का चलन बढ़ा है। पूरे राज्य में करीब 50 बड़े निजी आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) सेंटर चल रहे हैं। इन सेंटरों की संचालकों की मानें तो स्पर्म फर्टिलाइजेशन के लिए पहुंचने वाले 100 दंपतियों में 5 प्रतिशत दंपती किराए की कोख की मांग करते हैं।

स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ पी चौधरी ने बताया कि सरोगेट मदर के लिए पूरी प्रक्रिया में करीब 5 से 6 लाख रुपए खर्च आते हैं। एक अनुमान के मुताबिक पूरे रांची जिले में हर महीने करीब 3 करोड़ रुपए का कारोबार इस माध्यम से होता है।

इसके मध्य नज़र झारखंड में अप्रैल के अंत तक राज्य सरोगेसी बोर्ड का गठन हो जाएगा। स्वास्थ्य विभाग ने ड्राफ्ट बना लिया है। केंद्रीय सरोगेसी रेगुलेशन बिल-2020 के तहत झारखंड में स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता की अध्यक्षता में बोर्ड के गठन का प्रस्ताव है।

सरोगेसी बच्चे को जन्म देने की तकनीक है। जो दंपती किसी वजह से संतान को जन्म नहीं दे पाते हैं, वे इसका सहारा लेते हैं। इसमें एक महिला की कोख किराए पर ली जाती है।

फिर आईवीएफ के जरिए शुक्राणु को कोख में प्रतिरोपित किया जाता है। जो महिला बच्चे को कोख में पालती है, उसे सेरोगेट मदर कहा जाता है।

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