झारखंड के विपक्ष में भाजपा में एकजुटक्ता की कमी दिख रही है।इसके हर नेता अपना वक्तव देनें में सबसे आगे लगते हैं।उदाहरण के तौर पर इनके नेताओं के बोल को हेमंत सोरेन सरकार द्वारा पास किया गया 1932 आधारित खतियान पर बनी स्थानीय नीति को लें।

भाजपा के लोक सभा सदस्य निशिकांत दुबे कहते हैं कि पूरा पालमु, कोलहान,सनथाल परगना के अधिकतर हिस्से ओर धनबाद 1932 के सर्वे में चिंहित नही हैं।राज्य के ज़्यादातर अनुसूचित जाति के लोगों के पास घर भी नही है।1947 में देश के बंटवारे के बाद हज़ारों लोग यहाँ आकर बसे।झारखंड के 3.5 करोड़ यानी दो तिहाई लोगों के लिए क्या नीति है, राज्य सरकार को इसे बताना चाहिये।

दूसरी ओर भाजपा की कोर कमिटी की बेठक बृहस्तवार के दिन हुई। बाद में राज्य के दो नेता बाबूलाल मरानडी ओर केंद्रीय मंत्री अनुपूर्णा देवी ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में हेमंत कैबिनेट द्वारा 1932 सर्वे के आधार पर स्थानीयता नीति का विरोध किया। 

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राज्य के भाजपा अध्यक्ष दीपक प्रकाश ने कहा कि इसे भ्रामक तथ्यों के आधार पर बना कर झारखंड में विद्वेष का बीज बोया है।

कांग्रेस जो हेमंत सरकार में एक घटबंधन का हिस्सा है में भी विद्रोह की गूंज सुनाई दे रही है।इसके नेता मधु कोड़ा ओर उनकी पत्नी गीता कोड़ा जो लोक सभा सदस्य हैं, ने भी स्थानीयता नीति का विरोध किया है।

कोड़ा ने कहा है की सरकार के इस फैसले का सबसे अधिक नुकसान कोल्हान में रहनेवाले लोगों को होगा। गुरुवार को उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की इस पहल से कोल्हान के तीनों जिलों, सरायकेला खरसावाँ, पूर्वी सिंहभूम और पश्चिमी सिंहभूम के लाखों लोग स्थानीयता की परिभाषा से प्रभावित होंगे। उन्होंने कहा कि राज्य के कई जिलों में अलग-अलग भूमि सर्वे किया गया है। कोल्हान में यह सर्वे 1964-1965 का है। ऐसे में 1932 के खतियान आधारित नीति लागू होने से कोल्हान के लोग झारखंड के मूलनिवासी नहीं माने जाएंगे।

कोड़ा ने कहा कि राज्य में महागठबंधन की सरकार है। राज्य के विकास के लिए क्या क्या मुद्दा आएगा उसके लिए कोआर्डिनेशन कमेटी बनी है, लेकिन इस नीति को ना ही कोआर्डिनेशन कमेटी में लाया गया ना ही स्टैंडिंग कमेटी में। इससे यह साफ है कि सरकार ने चोरी छुपे इस नीति को लाने का काम किया है जो महागठबंधन के हित में भी नहीं है।

 

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि 1932 आधारित खतियान पर बनी स्थानीय नीति से कई जिलों के युवा सरकारी नौकरी, छात्रवृत्ति आदि से वंचित हो जाएंगे। कोड़ा ने सवालिया लहजे में कहा कि आखिर ऐसे नीति क्यों बनाई जा रही है। उन्होंने कहा आजादी के पहले जो भी सर्वे हुआ था वह कुछ विशेष लोगों के द्वारा किया गया था। वहीं आजादी के बाद इसका फायदा राज्य के आदिवासी मूलवासी लोगों को नहीं मिला। जिसके कारण फिर से रिसेटेलमेंट का काम किया गया जो 1965 में पूरा हुआ, ताकि भूमिहीनों को अधिकार मिल सके। बता दें की मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा झारखण्ड की सिंहभूम लोकसभा सीट से कांग्रेस की इकलौती सांसद हैं।

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