रांची की अदालत में प्रवर्तन निदेशालय ने कहा : सोरेन के खिलाफ केस लड़ रहे अधिवक्ता को फँसाने की थी साज़िश.

झारखण्ड उच्च न्यायालय में अधिवक्ता राजीव कुमार ने जनहित याचिका दायर कर मुख्यमंत्री एवं खनन विभाग भी देख रहे हेमंत सोरेन पर स्वयं ही स्वयं को खनन पट्टा देने के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की थी. वहीं दूसरी जनहित याचिका में कहा गया था कि मुख्यमंत्री कथित रूप से शेल कंपनियों और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े हैं.

इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने रांची के विशेष न्यायालय में स्पष्ट रूप से कोलकाता पुलिस पर व्यवसायी अमित अग्रवाल का पक्ष लेने का आरोप लगाते हुए कहा है कि साक्ष्यों के अनुसार

अमित अग्रवाल ने झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विरुद्ध परोक्ष - अपरोक्ष रूप में दायर दो जनहित याचिकाओं में से एक याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करनेवाले अधिवक्ता राजीव कुमार को फँसाने के लिए आपराधिक साजिश रची थी और इसमें उन्हें कोलकाता पुलिस का खुला साथ मिला.

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा व्यवसायी अमित अग्रवाल की गिरफ्तारी के बाद रांची की एक विशेष अदालत को बताया गया कि एक जनहित याचिका में जहाँ कथित तौर पर खुद को खनन पट्टा देने के लिए खनन विभाग रखने वाले सोरेन के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की गई थी वहीं दूसरी जनहित याचिका में कहा गया था कि मुख्यमंत्री कथित रूप से शेल कंपनियों और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े हैं. फिलहाल इन दोनों मामलों की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की जा रही है.

ज्ञातव्य है कि राजीव कुमार को कोलकाता पुलिस ने पिछले 31 जुलाई 2022 को अमित अग्रवाल की शिकायत के आधार पर गिरफ्तार किया था. अग्रवाल ने आरोप लगाया था कि उन्हें वकील को रिश्वत देने के लिए बाध्य किया गया था क्योंकि अधिवक्ता राजीव कुमार ने वादा किया था कि वह उन्हें शेल कंपनियों और मनी लॉन्ड्रिंग पर दायर जनहित याचिका में राहत दिलवाने की व्यवस्था करवा देंगे. राजीव कुमार अभी रांची में न्यायिक हिरासत में हैं.

रांची में पीएमएलए अदालत में अग्रवाल को पेश करते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने अपने रिमांड पेपर में आरोप लगाया कि एक हज़ार करोड़ रूपये के अवैध खनन मामले में अपराध की आय में कथित तौर पर सीएम सोरेन के विधायक प्रतिनिधि एवं सहयोगी पंकज मिश्रा शामिल हैं.

ईडी ने यह भी आरोप लगाया है कि अधिवक्ता कुमार के खिलाफ अग्रवाल की झूठी शिकायत पूरी तरह से शेल कंपनियों के सन्दर्भ में दायर जनहित याचिका के शिकायतकर्ता, वकील, सरकारी अधिकारियों और न्यायपालिका के बीच एक साजिश के रूप में पेश करने के लिए की गयी थी और यह साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट रूप से साबित होता है.

अधिवक्ता राजीव कुमार इस मामले में शिव शंकर शर्मा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जिन्होंने झारखण्ड उच्च न्यायालय के समक्ष एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि अग्रवाल के स्वामित्व वाली कई कंपनियां कथित रूप से सोरेन परिवार के इशारे पर मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल है.

ईडी ने अदालत को यह भी बताया कि अमित अग्रवाल द्वारा दायर शिकायत के पीछे एकमात्र उद्देश्य अपने लाभ के लिए चल रही जनहित याचिका को बाधित करना था जो 1,000 करोड़ रुपये से अधिक रकम से सम्बंधित है. जाँच में यह भी पता चला कि इस पीओसी का एक बड़ा हिस्सा अमित अग्रवाल की कंपनियों के जरिए लॉन्ड्रिंग किया जा रहा था. 

यह कृत्य अर्थात राजीव कुमार को रिश्वत की पेशकश करना और उन्हें फंसाना जांच को दूर धकेलने का एक प्रयास था ताकि छुपा हुआ पीओसी सामने न आने पाये क्योंकि वह जनहित याचिका के कारण उच्च न्यायालय के संभावित आदेश का आकलन कर उसे स्वयं के विरुद्ध पा रहे थे.

ईडी ने अदालत को यह भी बताया कि अग्रवाल ने कोलकाता पुलिस को दी गयी अपनी शिकायत में दावा किया था कि राजीव कुमार ने उनसे रिश्वत की मांग की थी. प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी जाँच में यह पाया कि अग्रवाल खुद ही राजीव कुमार को वह रिश्वत देने और प्रभावित की कोशिश कर रहे थे, जो इसे स्वीकार करने के लिए इच्छुक थे.

ईडी ने कहा कि अमित अग्रवाल ने अपने बैंक खाते से 60 लाख रुपये निकाले जिसमें से 50 लाख रुपये राजीव कुमार को फंसाने के लिए इस्तेमाल किया गया. इस प्रकार से उक्त राशि ही वास्तव में अपराध की आय थी जो अमित अग्रवाल द्वारा उत्पन्न की गई थी और राजीव कुमार द्वारा उसे प्राप्त किया गया था.

ईडी ने कोलकाता पुलिस पर अग्रवाल का पक्ष लेने का भी आरोप लगाया. निदेशालय ने कहा कि आरोपी के कोलकाता पुलिस के साथ संबंध और निकटता है जिसे उसने अपने लाभ के लिए भुनाया और जाँच को दिग्भ्रमित करने के लिये कोलकाता पुलिस के परिचित अधिकारियों की मदद से राजीव कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज़ की गयी और उसे भी अपने आवास के साथ-साथ अपने कार्यालय की सीमा के बाहर के पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया. 

ईडी ने कहा कि उसे जाँच में यह भी पता चलता है कि पुलिस ने अमित अग्रवाल की शिकायत की सामग्री का सत्यापन भी नहीं किया और जानबूझकर पीसी अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की ताकि यह दिखाया जा सके कि जनहित याचिका आवेदक, अधिवक्ता, अदालत के अधिकारियों और अन्य सरकारी अधिकारियों के बीच साजिश का परिणाम थी.

अग्रवाल ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि वकील कुमार ने जस्टिस, कोर्ट अधिकारियों और अन्य सरकारी एजेंसियों के प्रबंधन द्वारा सम्बंधित मुद्दे को सुलझाने के आश्वासन के साथ पैसे माँगे गये थे. हालांकि, ईडी ने यह भी कहा कि अमित अग्रवाल उसे राजीव कुमार ने कथित रूप से रिश्वत की मांग करते समय किसी सरकारी अधिकारी का नाम नहीं बताया था.

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