राज्य पशुपालन विभाग को रांची, देवघर एवं चतरा जिला पशुपालन पदाधिकारी द्वारा जानवरों में लम्पी वायरस जैसे लक्षण की सूचना प्राप्त हुई है। लम्पी वायरस के संभावित खतरे को देखते हुए विभाग द्वारा इसकी रोकथाम एवं नियंत्रण हेतु सभी जिला पशुपालन पदाधिकारी एवं नोडल पदाधिकारियों को वर्चुअल मीटिंग में आवश्यक दिशा निर्देश दिए गए हैं।

पदाधिकारियों को सूचित किया गया है कि इस तरह की बीमारी से संक्रमित पशु अगर उनके जिले में पाए जाएं, तो नमूने (Scab from Lesion, Nasal Swab and serum in ice pack) को कोल्ड चेन में रख कर शीघ्र संस्थान को भेजें, ताकि जांच हेतु सैम्पल को ICAR-NIHSAD भोपाल भेजा जा सके।

इस बीमारी की रोकथाम में प्रचार-प्रसार के लिए निदेशक, पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन संस्थान, कांके, राँची द्वारा पम्पलेट छपाई हेतु आदेशित किया जा चुका है। दो दिनों के अंदर आमजन, पशुपालकों को ये पम्पलेट वितरित किये जायेंगे। पशुपालकों को इस बीमारी की जानकारी एवं सलाह हेतु विभाग द्वारा टोल फ्री नंबर 1800309771 जारी किया गया है। इस नंबर पर पूर्वाह्न 11:00 से अपराह्न 5:00 के बीच पशु चिकित्सक से सलाह ले सकते हैं।

इस बीमारी के लक्षण पालाजोरी एवं रांची में मिले हैं। लेकिन, अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है। पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन संस्थान में इसकी जांच की जा रही है। सभी जिला पशुपालन पदाधिकारी को सतर्क रहने एवं टीका खरीदने को कहा गया है।

*संक्रामक बीमारी है लम्पी*

लम्पी एक विषाणुजनित संक्रामक बीमारी है , जो मुख्यतः गोवंश को संक्रमित करता है। यह रोग मुख्य रूप से संक्रमित मक्खियों, मच्छरों एवं चमोकन के काटने से होता है। बीमार पशु के नाक, मुख के स्राव एवं घावों से, बीमार दुधारू गाय, भैंस के थन में घाव हो जाने के कारण दूध पीने वाले बाछा/ बाछियों में यह बीमारी फैल जाती है। गर्भवती गाय, भैंस यदि इस रोग से संक्रमित हो गए हैं, तो जन्म लेने वाले उनके बच्चों में भी यह बीमारी जन्म से आ जाती है। संक्रमित सांढ़, भैंसा से गर्भधारण कराने पर अथवा संक्रमित सीमेन द्वारा एआई कराने पर भी यह रोग फैलता है ।

*संक्रमित पशुओं में बीमारी के लक्षण*

पशुओं के संक्रमित होने पर उनके आंख एवं नाक से स्राव शुरू होता है। तेज बुखार, दुग्ध उत्पादन में गिरावट तथा संक्रमित पशुओं के त्वचा पर गांठदार घाव उभर जाते हैं। लगभग पूरे शरीर की त्वचा पर 10 से 50 मिलीमीटर तक के गोलाकार गांठ उभर जाते हैं, जो कुछ समय पश्चात सूखा घाव में परिवर्तित हो जाता है। कभी-कभी संक्रमित पशुओं में निमोनिया का लक्षण भी पाया जाता है। मादा पशुओं में थनैला हो जाना आम बात है। इस बीमारी से मृत्यु दर लगभग 10% तक है।

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