झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और हाल ही में झामुमो को बाय-बाय कर भाजपा में शामिल हुए चम्पाई सोरेन ने अपने एक्स हैंडल पर बड़ी बात कही है। उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठियों पर नकेल कसने की वकालत की है। 

लिखा है कि वोट बैंक के लिए कुछ राजनीतिक दल भले ही आंकड़े छुपाने का प्रयास करे, लेकिन शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गाड़ लेने से सच्चाई नहीं बदल जाती। 

वहां की वोटर लिस्ट पर नजर डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी माटी, हमारी जन्मभूमि से हमें ही बेदखल करने में बांग्लादेशी घुसपैठिये काफी हद तक सफल हो गए हैं। 

चम्पाई ने लिखा है कि संताल हूल के दौरान स्थानीय संताल विद्रोहियों के डर से अंग्रेजों ने पाकुड़ में मार्टिलो टावर का निर्माण करवाया था, जो आज भी है। 

इसी टावर में छिपकर अंग्रेज सैनिक स्वयं बचते हुए छेद से बंदूक द्वारा पारंपरिक हथियारों से लैस संताल विद्रोहियों पर गोलियां बरसाते थे। इस वीर भूमि की ऐसी कई कहानियां आज भी बड़े-बुजुर्ग गर्व के साथ सुनाते हैं, लेकिन क्या आपको यह पता है कि आज उसी पाकुड़ में हमारा आदिवासी समाज अल्पसंख्यक हो चुका है। 

पाकुड़ के जिकरहट्टी स्थित संताली टोला और मालपहाड़िया गांव में अब आदिम जनजाति का कोई सदस्य नहीं बचा है तो आखिर वहां के भूमिपुत्र कहां गए। उनकी जमीन, उनके घरों पर अब किसका कब्जा है। 

इसके साथ-साथ वहां के दर्जनों अन्य गांवों-टोलों को जमाई टोला में कौन बदल रहा है। अगर वे स्थानीय हैं तो फिर उनका अपना घर कहां है। वे लोग जमाई टोलों में क्यों रहते हैं। किस के संरक्षण में यह गोरखधंधा चल रहा है। 

इस ज्वलंत मुद्दे पर विचार-विमर्श करने के लिए 16 सितंबर को आदिवासी समाज द्वारा पाकुड़ जिले के हिरणपुर प्रखंड में मांझी परगना महासम्मेलन का आयोजन किया गया है। 

इसी दिन बाबा तिलका मांझी और वीर सिदो-कान्हू के संघर्ष से प्रेरणा लेकर हमारा आदिवासी समाज अपने अस्तित्व तथा माताओं, बहनों एवं बेटियों की अस्मत बचाने हेतु सामाजिक जन-आंदोलन शुरू करेगा। 

उन्होंने अपने एक्स हैंडल में लिखा है कि हमें विश्वास है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह करने वाले बलिदानियों की इस धरती पूरे संताल-परगना को बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ संघर्ष की राह दिखाएगी।

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