भारत की सांस्कृतिक परंपरा में मकर संक्रांति केवल एक खगोलीय तिथि नहीं, बल्कि प्रकृति, श्रम और जीवन के नवचक्र का उत्सव है। 

मकर संक्रांति का अलग राज्यों में हैं ...भारत में मकर संक्रांति को विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है, जैसे तमिलनाडु में पोंगल, पंजाब-हरियाणा में लोहड़ी/माघी, उत्तर प्रदेश-बिहार में खिचड़ी, असम में माघ बिहू, गुजरात-राजस्थान में उत्तरायण, उत्तराखंड में उत्तरायणी, झारखंड में टुसू के नाम से जाना जाता है, जो मुख्य रूप से सूर्य के उत्तरायण होने और नई फसल के आगमन का पर्व है.

सूर्य के उत्तरायण होने के साथ खेतों में लहलहाई फसल, भरे खलिहान और किसान के चेहरे की तृप्त मुस्कान उत्सव का रूप ले लेती है। इसी लोकधारा में झारखंड की मिट्टी से उपजा टुसू पर्व अपनी विशिष्ट पहचान के साथ सामने आता है—एक ऐसा पर्व, जो लोक-संस्कार, नारी सम्मान और सामाजिक एकता का सजीव प्रतीक है।

झारखंड की संस्कृति में “बारह मासे तेरह परब” केवल कहावत नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। इन्हीं परबों में टुसू का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह पर्व अगहन संक्रांति से आरंभ होकर मकर संक्रांति तक चलता है और आज कई क्षेत्रों में माघ मास तक मेलों के रूप में जीवंत रहता है। विशेष रूप से झारखंड के पांच परगना क्षेत्र, रांची  जिला के आस-पास तथा पुरुलिया–मानभूम अंचल में टुसू केवल पर्व नहीं, बल्कि जन-जीवन की धड़कन बन जाता है।

धान, धन और आनंद का लोकपर्व :

टुसू पर्व उस समय आता है जब किसान अपनी मेहनत का फल पा चुका होता है। धान की कटाई पूरी हो जाती है, खलिहान भर जाते हैं और घर-घर समृद्धि का वास होता है। यही कारण है कि टुसू को संपन्नता का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर बनाए जाने वाले चौड़ल (बांस, लकड़ी और रंगीन कागज से सजे भव्य ढांचे) लोककला, सामूहिक श्रम और रचनात्मकता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। मेलों में चौड़ल प्रतियोगिताएं इस उत्साह को और ऊंचाई देती हैं।

गीतों में पूजा, गीतों में ही विदाई :

टुसू की पूजा - मंत्रों से नहीं, बल्कि लोकगीतों से होती है। पूरे पुस महीने तक प्रतिदिन संध्या बेला में दीप-आरती और ताजे फूलों के साथ टुसू गीत गाए जाते हैं। इन गीतों में नारी जीवन की कोमल भावनाएं, आशा-आकांक्षा और लोकदर्शन समाया रहता है।

टुसू थापना का एक लोकप्रिय गीत -

“अगहन सांकराइते टुसू,
हांसे-हांसे आबे गो।
पुसअ सांकराइते टुसू,
कांदे-कांदे जाबे गो।।”

यह गीत पूरे पर्व की आत्मा को व्यक्त करता है - आगमन में हर्ष और विदाई में करुणा।

मकर संक्रांति की पूर्व दिन बांउड़ी संध्या को जागरण होता है। गांव-गांव चौड़ल के साथ भ्रमण, ढोल-नगाड़ा, धमसा और शहनाई की गूंज से वातावरण लोक-संगीत में डूब जाता है। अगले दिन करुण और मार्मिक गीतों के साथ टुसू का विसर्जन प्रायः स्वर्णरेखा नदी और अन्य नदियों के तट पर होता है।

विसर्जन के समय गाया जाने वाला एक मार्मिक गीत -

“तिरिस दिन जे राखिली टुसू,
तिरिस बाति दिये गो।
आर कि राखिते पारि टुसू,
मकर हइलो बादि गो।।”

इन पंक्तियों में लोक-मन की संवेदना, विरह और श्रद्धा एक साथ बहती है।

नारी सम्मान और सामाजिक समरसता :

टुसू पर्व में कुंवारी कन्याओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। टुसू की स्थापना, सेवा और गीतों के माध्यम से वे नारी शक्ति, शालीनता और सृजनशीलता का संदेश देती हैं। यह पर्व जाति-धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर समाज को जोड़ता है। गुड़ पिठा, तिल-चिउरा, मांस-भात जैसे पारंपरिक व्यंजन और खेल-कूद इस उत्सव को और जीवंत बनाते हैं।

आज की चुनौती, कल की जिम्मेदारी :

यह सत्य है कि समय के साथ टुसू पर्व का पारंपरिक उल्लास कुछ कम हुआ है। आधुनिकता और औपचारिकता ने इसकी सहजता को प्रभावित किया है। लेकिन लोक-संस्कृति तभी जीवित रहती है, जब नई पीढ़ी उसे समझे, अपनाए और आगे बढ़ाए।

टुसू पर्व केवल एक लोक-उत्सव नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा है। जहां श्रम का सम्मान है, अन्न के प्रति कृतज्ञता है, नारी गरिमा का आदर है और सामाजिक एकता की मजबूत डोर है। यदि हम इसे केवल रस्म नहीं, बल्कि संवेदना के साथ मनाएं, तो टुसू की लोकधुन आने वाली पीढ़ियों तक अपनी मिठास और संदेश के साथ गूंजती रहेगी।

 

By- Hemant Kumar 

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