स्वतंत्र भारत की राजनीति और चिंतन धारा पर जिन चंद लोगों ने सबसे गहरा असर डाला है, उनमें डॉ. राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण प्रमुख हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी दौर में भी इन दोनों की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण रही है।

गांधी का प्रभाव
राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को फैजाबाद में हुआ था।लोहिया की मां उन्हें जन्म देने के थोड़े ही समय बाद चल बसी थीं। उनके पिताजी हीरालाल पेशे से अध्यापक व राष्ट्रभक्त थे। वे गांधीजी के अनुयायी थे। जब वे गांधीजी से मिलने जाते तो राम मनोहर को भी साथ ले जाया करते थे। इसके कारण गांधीजी के विराट व्यक्तित्व का उन पर गहरा असर हुआ। पिताजी के साथ 1918 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार शामिल हुए। बनारस से इंटरमीडिएट और कोलकता से स्नातक तक की पढ़ाई की। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए बर्लिन गए । उन्होंने मात्र तीन माह में जर्मन भाषा पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली। सिर्फ दो वर्ष में अर्थशास्‍त्र में डॉक्‍टरेट की उपाधि प्राप्‍त कर ली। जर्मनी में चार साल व्‍यतीत करके, डॉ. लोहिया स्‍वदेश वापस लौटे और किसी सुविधापूर्ण जीवन के स्‍थान पर जंग-ए-आजादी में खुद को झोंक दिया।
1933 में मद्रास पहुंचने पर लोहिया गांधीजी के साथ मिलकर देश को आजाद कराने की लड़ाई में शामिल हो गए। इसमें उन्होंने विधिवत रूप से समाजवादी आंदोलन की भावी रूपरेखा पेश की। सन् 1935 में उस समय कांग्रेस के अध्‍यक्ष रहे पंडित नेहरू ने लोहिया को कांग्रेस का महासचिव नियुक्‍त किया।

भारत छोड़ो आंदोलन का भूमिगत रह कर नेतृत्व किया

अगस्‍त 1942 को महात्‍मा गांधी ने भारत छोडो़ आंदोलन का ऐलान किया जिसमें उन्होंने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और संघर्ष के नए शिखरों को छूआ। जयप्रकाश नारायण और डॉ. लोहिया हजारीबाग जेल से फरार हुए और भूमिगत रहकर आंदोलन का शानदार नेतृत्‍व किया। लेकिन अंत में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और फिर 1946 में उनकी रिहाई हुई।

समाजवाद के योद्धा, विश्व नागरिकता के स्वप्नदृष्टा

डॉ. लोहिया भारत में समाजवादी विचारधारा के सबसे मजबूत स्तंभों में थे। वे चाहते थे कि व्यक्ति-व्यक्ति के बीच कोई भेद, कोई दुराव और कोई दीवार न रहे। सब जन समान हो, सब जन का मंगल हो।उन्होंने सदा ही विश्व-नागरिकता का सपना देखा था। वह मानव-मात्र को किसी देश का नहीं बल्कि विश्व का नागरिक मानते थे। जनता को वह जनतंत्र का निर्णायक मानते थे।

अंग्रेजी हटाओ हिन्दी लाओ के परोकार

अंग्रेज़ी हटाना और हिंदी लाना डाॅ. लोहिया के एजेंडे में सबसे ऊपर रहा था। लोहिया अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, मराठी और बांग्ला धड़ल्ले से बोल सकते थे, लेकिन वे हमेशा हिंदी में बोलते थे, ताकि आम लोगों तक उनकी बात ज्यादा से ज्यादा पहुंचे।
वहीं लोहिया व्यक्ति पूजा के भी विरोधी थे। वे कहते थे कि किसी शख़्सियत का जन्मदिन मनाने या उसकी मूर्ति लगाने से, उसके निधन के 300 साल बाद तक परहेज रखना चाहिए ताकि इतिहास निरपेक्ष होकर यह फैसला कर पाए कि वह इसकी हक़दार थी या नहीं।

जाति तोड़ो’ आंदोलन भी चलाया
फर्रुखाबाद में यह याद करने वाले भी कम ही हैं कि एक समय डाॅ. लोहिया ने यहां ‘जाति तोड़ो’ आंदोलन भी चलाया था। लेकिन उनका दुर्भाग्य रहा कि उनके शिष्य कहे जानेवाले समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद और रामविलास पासवान आदि ने जातिवादी राजनीति को ही अपना आधार बनाया। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि जातीय गोलबंदियों को हराकर ही दी जा सकती है।

नेहरू से मोहभंग, खुल कर विरोध किया

1946-47 के वर्ष लोहिया की जिंदगी के अत्‍यंत निर्णायक वर्ष रहे। आजादी के समय उनके और पंडित जवाहर लाल नेहरू में कई मतभेद पैदा हो गए थे, जिसकी वजह से दोनों के रास्ते अलग हो गए।
लोहिया अक्सर यह कहा करते थे कि उन पर केवल ढाई आदमियों का प्रभाव रहा, एक मार्क्‍स का, दूसरे गांधी का और आधा जवाहरलाल नेहरू का। आजादी के बाद लोहिया ने जनपक्षधरता की राजनीति शुरू की। लोहिया ने नेहरू का विरोध करने का साहस उस दौर में दिखाया जब देश जवाहर लाल नेहरू को अपना सबसे बड़ा नेता मान रहा था, ये लोहिया ही थे जिन्होंने नेहरू को सवालों से घेरना शुरू किया था। उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के प्रतिदिन 25 हज़ार रुपये खर्च करने पर सवाल उठाया।
नेहरू से उनकी तल्खी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक बार ये भी कहा था कि बीमार देश के बीमार प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए
1962 में लोहिया फूलपुर में जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने चले गए. उस चुनाव में लोहिया की चुनाव प्रचार की टीम का हिस्सा रहे सतीश अग्रवाल याद करते हैं, "लोहिया जी कहते थे मैं पहाड़ से टकराने आया हूं. मैं जानता हूं कि पहाड़ से पार नहीं पा सकता लेकिन उसमें एक दरार भी कर दी तो चुनाव लड़ना सफल हो जाएगा।

जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं

लोहिया वो पहले राजनेता रहे जिन्होंने कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए कहा था जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं।
जब 1967 में जब हर तरफ कांग्रेस का जलवा था, तब लोहिया इकलौते ऐसे शख़्स थे जिन्होंने कहा था कि कांग्रेस के दिन जाने वाले हैं और नए लोगों का जमाना आ रहा है. नौ राज्यों में कांग्रेस हार गई थी।

सिर्फ एक बार लोकसभा चुनाव जीते
लोहिया सिर्फ एक बार ही कन्नौज से 1967 लोकसभा में विजयी हुए थे, लेकिन भारतीय राजनीति में उनका प्रभाव बहुत अधिक था। वे गैर कांग्रेस वाद के सबसे बड़े प्रतीक बन गए थे।

इंदिरा को गूंगी गुड़िया कहा
लोहिया ने नेहरू के बाद इंदिरा गांधी का विरोध किया। उन्होंने बेबाकी से इंदिरा के संसद में चुप रहने पर गूंगी गुड़िया की संज्ञा दी थी।
गांधी जी के कहने पर छोड़ी सिगरेट

महात्मा गांधी ने लोहिया से सिगरेट पीना छोड़ देने को कहा था. लोहिया ने बापू को कहा था कि सोच कर बताऊंगा. और तीन महीने के बाद उनसे कहा कि मैंने सिगरेट छोड़ दी।

लिव इन रिलेशनशिप में रहे थे लोहिया

लोहिया जीवन भर रमा मित्रा के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहे. रमा मित्रा दिल्ली के मिरांडा हाउस में प्रोफेसर रहीं. दोनों के एक दूसरे को लिखे पत्रों की किताब भी प्रकाशित हुई. शिवानंद तिवारी बताते हैं, "लोहिया ने अपने संबंध को कोई छिपाकर नहीं रखा था. लोग जानते थे, लेकिन उस दौर में निजता का सम्मान किया जाता था।

एम एफ हुसैन को दी रामायण पर पेंटिंग की सलाह

वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से समाजवाद पर बहस कर सकते थे और मक़बूल फ़िदा हुसेन जैसे कलाकार की कला को भी राह दिखा सकते थे. दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में लोहिया ने ही मक़बूल फ़िदा हुसेन को कहा था, "ये जो तुम बिरला और टाटा के ड्राइंग रूम में लटकने वाली तस्वीरों से घिरे हो, उससे बाहर निकलो. रामायण को पेंट करो."

अस्पताल की लापरवाही के चलते मौत

लोहिया की मौत भी कम विवादास्पद नहीं रही. उनका प्रोस्टेट ग्लैंड्स बढ़ गया था और इसका ऑपरेशन दिल्ली के सरकारी विलिंग्डन अस्पताल में किया गया था। उनकी मौत के बारे में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने ऑटो बायोग्राफी बियांड द लाइन्स में भी किया है. इसमें उन्होंने लिखा है, "मैं राम मनोहर लोहिया से अस्पताल में मिलने गया था. उन्होंने मुझसे कहा कुलदीप मैं इन डॉक्टरों के चलते मर रहा हूं.। कुलदीप आगे लिखते हैं कि लोहिया की बात सच ही निकली क्योंकि डॉक्टरों ने उनकी बीमारी का गलत इलाज कर दिया था.।12 अक्टूबर 1967 को लोहिया का 57 वर्ष की आयु में देहांत हो गया।
उनकी मौत के बाद आज यही अस्पताल राम मनोहर लोहिया अस्पताल के रूप में जाना जाता है।

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