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झारखण्ड वन अधिकार मंच के द्धारा राज्य में अनुसूचित जनजाति एंव अन्य परंपरागत वननिवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 या वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन और इस क्रान्तिकारी कानून का फायदा वन आश्रित समुदायों तक पहॅूचान और त्वरित गति से उसको लागू करने के मकसद से 20-4-2018 को एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया जाएगा। कम्पा कानून और हाल में प्रकाशित राष्ट्रीय वननीति के विरोध में ंभी उक्त  वार्ता का आयोजन किया जा रहा है ताकि इस कानून का लाभ वन आश्रित समुदाय को सही रूप में पहॅूचाया जा सके।

झारखण्ड वन अधिकार मंच झारखण्ड राज्य में कार्यरत .24 जन संगठनों और स्वयं सेवी संस्थाओं का एक मंच है जिसका सृजन 2014 में हुआ और जो वन अधिकार कानून 2006 के प्रवधानों के अनुसार वनआश्रित समुदायों को वन अधिकारों से निहित करने और इस क्रान्तिकारी कानून का फायदा वन आश्रित समुदायों तक पहॅूचान में प्रयासरत है।

गौरतलब  है कि ये कानून वन आश्रित समुदाय के साथ इस देश में अंग्रेज़ों के जमाने से होते आये ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए बनाया गया एक ऐतिहासिक कानून है। यह कानून वन संसाधनों को-जिस के अंतगत वनभूमि भी है-अपने आजीविका के लिए व्यक्तिगत और सामुदायिक रूप में उपयोग करने और जंगल का संवर्धन संरक्षण और प्रबन्धन करने का अधिकार देता है। इस कानून ने माना है कि वन आश्रित समुदाय जैव विविधता और पर्यावरण का अभिन्न अंग है और इनकी रक्षा वनआश्रित समुदायक के सहयोग से ही संभव है। परंतु कानून के क्रियान्वयन मे ंकेन्द्र और राज्य सरकारें ंगंभीर नहीं है

जिले और अनुमंडल स्तर के पदाधिकारी कानून एवं ग्रामसभा के अधिकारों की अनदेखी करते है वन विभाग का हस्तक्षेप और गैरकानूनी तरीके से दावित वन क्षेत्र में कटौती और उन्हें निरस्त किया जाता है।

इस प्रेस वार्ता में मीडिया जगत के साथी सादर आमंत्रित हंै।

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